गुरुवार, 31 मई 2012

aarakshan ka nag.... vinay jain

योग्यता और सुपात्रता का जाति से कोई लेना देना नहीं है -विनय जैन आरक्षण का नाग भारत को डसता जा रहा है इसे वापिस पिटारे मे डालो
संविधान निर्माता बाबा भीमराव अम्बेडकर ने सपने मे भी नहीं सोचा होगा जिसस दलित पिछड़े दबे-कुचलों के लिए जीवन भर संघर्श कर संविधान मे विषेश प्रावधानों का उपयोग कर इन्हें मुख्यधारा मे लाने का संकल्प किया था। दलित तो आज दलितो के द्वारा षोशित हैः- आज उसी का दुरूपयोग उन्हीं के अनुयायी अम्बेडकर के नाम पर अपनी-अपनी निहितार्थो की रोटियॉ सेंकने में मषगूल होंगे। आज आरक्षण प्राप्त एक अभिजात्य वर्ग सांसद, मंत्री, विधायक आई. ए. एस, प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर एवं अन्य प्रषासनिक अधिकारी तीन पीढ़ियो से आरक्षण पर अपना एकाधिकार जमाए बैठा है। अब ये वास्तविकों का हक मार उन्हें मुख्य धारा मे आने से रोकने के लिए उच्च वर्ग की तरह व्यवहार कर रहा है। उसे डर है कि कही ये आरक्षण का फल उससे छिन न जाये? आरक्षण-नेताओ के लालच और स्वार्थ सिद्धि का साधनः- आरक्षण को कुछ जातियों के प्रति समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाने के लिए संविधान मे बस आरंभ के मात्र दस पंद्रह वर्शो के लिए लाने की व्यवस्था की गयी थी,पर तब से आरक्षण व्यवस्था के रूप में नेताओं को राजनैतिक हथियार के रूप में देष की हर व्यवस्था से खेलने का मानो सर्वाधिकार मिल गया है। अब किन्ही जातियों को सहानुभूति के नाम पर देष के सारे संसाधनों, सारी व्यवस्थाओ मे सही योग्यता न होने पर भी खुली छूट बांटी जा रही है और ये सब सार्वभौमिक न्याय, नैतिकता और आदर्षो को ताक पर रखकर, देष के अधिसंख्य नागरिको के साथ अन्याय करके, योग्यता, कुषलता, मेहनत गुण और वास्तविक सामर्थय का अपमान करते हुए किया जा रहा है और जो अब राजनेताओं के लालच और स्वार्थ को सींचने का नियमित साधन बन गया है।
आरक्षण-देष के लिए खतराः- योग्यता और सुपात्रता का जाति से कोई लेना देना नहीं है और उसी तरह कुपात्रता और योग्यता का भी। जिस तरह से मात्र राजनैतिक हवस के लिए देष के भविश्य और समाज हित के साथ खुले आम खिलवाड़ चल रहा है वो राजनितिक डालो के लिए तो फायदेमंद है पर समूचे देष के लिए गहरा खतरनाक बनता जा रहा है। कम से कम इन्हें तो बख्ष दोः- आरक्षण के नाम पर देष के हर प्रतिश्ठित, विष्वनीय और निश्पक्ष षैक्षणिक संस्थान जैसे अखिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान या मैनेंजमेंनट बिजनेस संस्थानो इत्यादि अन्य सभी उच्च षिक्षा केन्द्रो को नेताओं के गंदे राजनीतिक खेल, सामाजिक कुंठा का बदला निकालने का, भीड़ जुटाकर नाजायज बात मनवाने और सरकारी जाति आधारित आयोगो के समर्थन से अवैध अधिकारों को पाने का अड्डा बना दिया गया है। अब षिक्षण संस्थानों को अपने चुनौतीपूर्ण महत्वपूर्ण कार्यो में कम और सरकारों और कोर्टो को सफाई देने मे अधिक व्यस्त रहना पड़ता है। आरक्षण-गुंडागर्दी एवं ब्लेकमेलिग का रास्ताः- आज कोई जातिवादी आयोग, कोई निकृश्ट नेता या मीडिया निर्धारित कर रहा है की एक षिक्षण संस्थान किस तरह काम करे। इसी का परिणाम है की वह छात्र जो सवर्ण छात्र के 90 परसंेट नही के अंको के मुकाबले 40 या 45 परसेंट पाकर विष्व में किसी भी सामान्य अभ्यर्थी के लिए अकल्पनीय और दुर्लभ विष्वप्रतिश्ठित डिग्री पा जाता है और उस चुनौती के योग्य न होने पर आगे चलकर अपने अक्षमता के जग जाहिर हो जाने पर उसे स्वीकार भी नही करता और उसे स्वीकार कर सुधरने की जगह गलत दिषा मे चला जाता है और उपलब्ध राजनैतिक संगठनो और दलो का संरक्षण लेकर राजनैतिक गुंडागर्दी और संवैधानिक ब्लैकमेल का रास्ता अपनाता है। नेताओ अपना इलाज इन्हीं अयोग्य डॉक्टरो से कराओः- सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियो के योग्य होने के बावजूद सींटे नहीं भरी जाती भले ही उसमे संस्थान और जनता का अहित होता रहे। आज यही निम्नीकरण हर संस्थान, सरकारी महकमे, हर पद और सीट पर किया जा रहा है और वोट बैंक की राजनीति करके देष की कार्यकुषलता को घटिया बनाने का पूरा दूरगामी इंतेजाम किया जा रहा है,बड़े ही षर्म की बात है कि एक अयोग्य आरक्षित छात्र जो षायद किसी और क्षेत्र मे सफल हो सकता हो उसे जबरस्ती उच्च षैक्षणिक पदों और अधिकारों पर बिठाया जा रहा है। जबरदस्ती डॉक्टर बनाया जा रहा है, और अब तो आरक्षण की खैरात पाना भी अपना अधिकार बताया जा रहा है। और जब ये नेता इन अयोग्य आरक्षितो को डॉक्टर बना रहे है तो अपना इलाज इन्हीं से क्यो नही कराते क्यो विदेष चले जाते है?
आरक्षण-एक लौलिपौप हैः- आरक्षण का लौलिपौप वास्तव में नेताओं के लिए स्थाई बोटबैंक बनाने का एक तरीका है और जिसमे विभिन्न जातियों के लोग सामान्य स्तर पर श्रम करने और संघर्श मे स्वयं को विकसित नहीं कर पाते जिसे उन्हें पैरो पर खडा होने मे कोई वास्तविक मदद नही मिलती बस मुप्त सामान पाने के सुख और किसी को दान देने का दंभ यही इसका कुल परिणाम है, पर राश्टीय संपदा या अधिकार कोई मुप्त में बॉटने या यू ही देने की वस्तु नहीं है सभी देषवासियों को अपना कौषल दिखने, अपना परिवार चलाने और धन कमाने का जन्म सिद्ध अधिकार है पर देष को भी न्याय और राश्टहित को अक्षुण्य रखने का अधिकार है। विनय कुमार जैन 9910938969

बुधवार, 30 मई 2012

guru aadesh hi mere jivan ka aadhar- muni pulaksagar

गुरू आदेष ही मेरे जीवन का आधार-मुनि पुलकसागर भोलानाथनगर ने लगाई मुनिश्री के चातुर्मास की हैट्रिक 27 मई 2012 अभी तक मुझे विभिन्न कॉलोनियो से चातुर्मास हेतु निमंत्रण आए। मै चाहता तो यहां मजमा लगा सकता था, सबको यहां बुला सकता था लेकिन थोडी सी ख्याती के लिए एक को खुष करके नौ को दुखी करना मेरा स्वभाव नहीं है। मै ऐसा चातुर्मास नहीं करना चाहता जिससे कोई दुखी हो।
उक्त विचार राश्ट्रसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने षंकरनगर स्थित जैन मंदिर के हॉल मे रविवार को श्रावको को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर मुनिश्री के आगामी चातुमार्स के लिए षंकरनगर जैन समाज की ओर से निवेदन किया गया। चातुर्मास के लिए क्या लॉटरी निकालनाः- मुनिश्री ने आगे कहा कि संतो का काम रूलाना नहीं हंसाना होता है। आज कल यह परम्पराएं हो रही है कि दस दस समाज से श्रीफल भेट करा लेते है फिर चातुर्मास के लिए लॉटरी निकाली जाती है यह सब नौटंकी है, हल्की पब्लिसिटी पाने का तरीका है। मै यह सब मे विष्वास नहीं करता हॅू। मेरे गुरूदेव आचार्य श्री पुश्पदंतसागर जी महाराज का आदेष जहां का होता है मै वही चातुर्मास करता हॅू। जहां दो किये वहां तीसरा भी:- मुनिश्री ने कहा कि जब तक मेरी सांसे चले तब तक मै भगवान महावीर से यही प्रार्थना करूंगा कि हे प्रभू मै जो भी कार्य करूं उन सब मे मेरे गुरूदेव का आषीर्वाद जरूर रहे। और आज उन्हीं गुरूदेव के द्वारा लिखित यह पत्र आया है जिसमे मुझे आगामी चातुर्मास के लिए आदेष दिया गया है कि जहां पहले दो चातुर्मास किये है वहां तीसरा भी करो। आगामी चातुर्मास भोलानाथ नगर मे करने का आदेष प्राप्त हुआ। गुरू की पाती षिश्य के नामः- इस अवसर पर जब मुनिश्री ने आचार्य श्री पुश्पदंतसागर जी महाराज द्वारा भेजे गए पत्र को पढा और आगामी चातुर्मास की घोशण की तो समूचा हॉल तालियों की गडगडाहट और जयकारों से गूंज गया। दिल्ली भारत की और यमुनापार जैन की राजधानी है क्योकि सबसे अधिक जैनो की आबादी इसी क्षेत्र मे निवासरत है। षंकरनगर मे आयोजित मां जिनवाणी षिक्षण षिविर जिस प्रभावना की उंचाई पर पहुंचा है उसका श्रेय बेषक जैन समाज षंकरनगर को ही जाता है। इस अवसर पर षिविर मे विषेश योग्यता अर्जित करने वाले षिविरार्थियो को पारितोशिक एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। भीड जुटा लेने का नाम चातुर्मास नहींः- चातुर्मास का महत्व बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि चातुर्मास मे साधू को अपनी साधना मे उतरने का मौका देता है। जैन धर्म प्रभावना की उंचाईयो पर चढ़े। चातुर्मास का अर्थ यह नहीं है कि भीड जुटा लेना, करोडो की बोलिया लग जाना, बडे बडे पाण्डाल लग जाना, बेनर पोस्टर लग जाने जाना, अखबारबाजी हो जाना चातुर्मास का अर्थ होता है कि दिगम्बर जैन परम्परा मे जो साधू है उन्होंने अपने साधना काल मे कितनी साधना व विरक्ति को बढाया उसका नाम चातुर्मास होता है। साधना का चार्जर है चातुर्मासः- चातुर्मास साधना का काल है। चातुर्मास अध्ययन का काल है। साधू एक जगह स्थिर रहकर अध्ययन करते है। अपनी साधना को बढ़ाते है क्योकि विहारी आदि नहीं होता है। मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार मोबाइल को चार घंटे चार्ज कर लो तो वह 12 घंटे तक चलता है उसी प्रकार साधू चार महिने तक साधना, तपस्या करते है और आठ महिने तक उसी त्याग, तपस्या के बल पर आठ महिने सर्वत्र विहार करके धर्म की प्रभावना किया करते है। चातुर्मास मेरा नहीं तुम्हारा होगाः- चातुर्मास मे आपको संयम का ध्यान रखना है, यह सोचना है कि हम कितनी साधना कर पाते है। कहीं ऐसा ना हो कि मुंह मे पान मसाला दबा हो और नारे लगा रहे हो कि हर मां का लाल कैसा हो पुलकसागर जैसा हो। ध्यान रखना यह चातुर्मास मेरा नहीं हकिकत मे तुम्हारा है। तुम कितनी साधना कर सकते हो, जैन धर्म का नाम कितना रौषन कर सकते हो यह चातुर्मास इसी समीक्षा का काल होता है।

jisse sansari jivo ki pahchan ho indriya kahlati hai. - muni pulak sagar

जिससे संसारी जीवो की पहचान हो इन्द्रिय कहलाती है-मुनि पुलकसागर कृश्णानगर मे आचार्य संमतिसागर जी से मिले मुनिश्री 23 मई 2012 जिससे संसारी जीवो की पहचान होती है उसे इन्द्र्रिय कहते है। इन्द्रिय पांच होती है। स्पर्षन इन्द्रिय,रसना इन्द्रिय, घ्राण इन्द्रिय, चक्षु इन्द्रिय और कर्ण इन्द्रिय। उक्त विचार राश्ट मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने आज बुधवार को मां जिनवाणी षिेिवर के पांचवे दिन षिविरार्थियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने षिविरार्थियों को इन्द्रियों की व्याख्या करते हुए कहा कि हल्का भारी, ठंडा गरम,कडा नरम,,रूखा चिकना आदि का ज्ञान होता है उसे स्पर्षन इन्द्रिय कहते है और जिससे खट्टा मीठा,कड़वा,कशायला,चरपरा आदि का ज्ञान हो उसे रसना इन्द्रिय कहते है। मुनिश्री ने घ्राण इन्द्रिय की परिभाशा को समझाते हुए कहा कि जिससे सुगंध एवं दुर्गंध का ज्ञान होता है उसे घ्राण इन्द्रिय कहते है तथा जिससे काला,नीला,लाल,हरा, सफेद आदि रंगो का ज्ञान होता है उसे चक्षु इन्द्रिय कहते है। सा, रे, गा, मा, प, ध, नि आदि स्वरो का ज्ञान कर्ण इन्द्रिय से होता है। मुनिश्री ने कहा कि मनुश्य पंचइन्द्रिय जीव है। पंचइन्द्रिय जीव दो प्रकार के होते है सैनाी और असैनी। जो जीव मन सहित होते है वे सैनी और मन से रहित होते है वे असैनी जीव कहलाते है।
संत मिलनः- कहते है संतो के दर्षन मात्र से पापो का नाष होता है आज ऐसा ही सौभाग्य कृश्णानगर जैन समाज को मिला जब आचार्य श्री संमतिसागर जी महाराज एवं मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज का मिलन हुआ। आज प्रातःकाल 6 बजे मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज अपने अनुज मुनिश्री प्रसंगसागर जी महाराज के साथ कृश्णानगर जैन मंदिर पहुंचे जहां पहले से विराजमान आचार्य रत्न संमतिसागर जी महाराज के दर्षन कर तत्त्व चर्चा की। मुनिश्री ने जैसे ही आचार्य श्री के चरणों मे नमोस्तु निवेदित किया तो उन्होंने विनय भाव का परिचय देते हुए मुनिश्री को गले से लगा लिया। मां जिनवाणी संग्रहालयः- संघस्थ प्रवक्ता विनय कुमार जैन ने बताया कि मुनिश्री के पावन आषीर्वाद एवं सद्प्रेरणा से पुलक जन चेतना मंच दिल्ली षाखा की ओर से विहारी कॉलोनी स्थित वात्सल्य भवन मे एक विषाल जिनवाणी संग्रहालय का निर्माण किया जा रहा है,जिसमे जिनागम की करीब 5000 षास्त्रो का संग्रह किया जाएगा। इस कार्य का षुभारंभ षंकरनगर से ही मां जिनवाणी के जन्म दिवस अर्थात श्रुत पंचमी से किया जा रहा है।

pooja hai jaruri- muni pulak sagar

भाव सहित अश्ट द्रव्य से पूजा करना ही ‘‘भाव पूजा’’-मुनि पुलकसागर 20 मई 2012 दिल्ली प्रभू पतितपावन मैं अपावन,चरन आयो सरन जी यो विरद आप निहार स्वामी,मेट जामन मरनजी।।
हे प्रभू,आप पतित पावन हो,पवित्र हो,मै अपावन हॅू,मै आपकी चरणों की षरण में आया हॅू,आप अपने विरद को,यष किर्ति को देखकर मेरे जन्म मरण को नश्ट करो। उक्त दर्षन स्तुति की समधुर व्याख्या आज रविवार को षंकरनगर जैन मंदिर मे आयोजित मां जिनवाणी षिक्षण षिविर मे राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने की। मुनिश्री के पावन सानिध्य मे आयोजित षिक्षण षिविर मे प्रथम वर्ग मे 450 षिविरार्थी एवं द्वितीय वर्ग मे 400 षिविरार्थी भाग ले रहे है। जरूरी है मूर्ति पूजाः- मुनिश्री ने मूर्ति पूजा को उचित बताते हुए कहा कि हम गुणों की पूजा करते है यह सत्य है लेकिन किसी को षरीर के महत्व को भी हम विस्मृत नहीं कर सकते है। केवल आत्मा संयास ग्रहण नहीं कर सकती है,षरीर को संयास ग्रहण करना पडता है क्योकि केवल आत्मा के पास षरीर नही होता है,सारे गुणो की उत्पत्ति षरीर से होता है। षरीर को हटाकर किसी की भी स्तुति नहीं कर सकते हो,इसलिए मूर्ति पूजा जरूरी है। भाव सहित पूजा भाव पूजा मुनिश्री ने भाव पूजा एवं द्रव्य पूजा मे अंतर बताते हुए कहा कि आज हमारे समाज मे भाव पूजा का अर्थ लोगो ने गलत लिया है लोग सोचते है कि बिना द्रव्य से भगवान की पूजा करना भाव पूजा है लेकिन यह सरासर गलत है बिना द्रव्य के पूजा करना गलत है,और आगम मे इसका निशेध है। मुनिश्री ने कहा कि अश्ट द्रव्य से पूजा करना तो द्रव्य पूजा कहलाता है जबकि अश्ट द्रव्य की पूजा मे अपने भावो को लगा देने को भाव पूजा कहते है अर्थात भाव सहित द्रव्य से पूजा करना ही भाव पूजा है। संघस्थ प्रवक्ता विनय कुमार जैन ने बताया कि मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज के पावन सानिध्य मे दोपहर तीन बजे से मूलाचार की नियमित कक्षाएं ली जा रही है जिसमे भी बडी संख्या मे स्वाध्यायी उपस्थित होकर आगम का ज्ञान अर्जित कर रहे है। विनय कुमार जैन

dev sastra guru par viswas kro- muni pulaksagar

षंकरनगर मे गूॅज रही है जिनवाणी ‘पुलकवाणी’ मे 18 मई 2012 षुक्रवार की सुबह का वह वक्त आ ही गया जिसका बेसर्बी से षंकरनगर जैन समाज इंतजार कर रही थी यह अवसर था राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज के पावन सानिध्य मे आयोजित आठ दिवसीय मां जिनवाणी षिक्षण षिविर के षुभारंभ का।
कार्यक्रम का षुभारंभ श्रीमति सुधा कृश्णा जैन षंकरनगर ने षिविर का उद्घाटन फीता काटकर किया तत्तपष्चात मां जिनवाणी के समक्ष मंगल कलष की स्थापना एवं दीपप्रवज्ज्लन अतिथियों के द्वारा किया गया। आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथी दिल्ली सरकार के षिक्षा मंत्री लबली सिंह थे। उन्होंने इस अवसर पर मुनिश्री को श्रीफल भेटकर आषीर्वाद प्राप्त किया। षिविर के पहले दिन को परिचय का दिवस बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि आज षिविर का पहला दिवस है,आज केवल आपको आपके कोर्स के बारे मे बताया जाएगा। मुनिश्री ने जैन धर्मालंबियों के देव,षास्त्र और गुरू के बारे मे अपने कर्त्तव्य के बारे मे विस्तार पूर्वक षिविरार्थियो को समझाया। उन्होंने बताया कि जैन षब्द की परिभाशा बताते हुए कहा कि जो भगवान जिनेन्द्र को मानता हो और उनके बताये गये मार्ग का अनुषरण करे वह जैन होता है। मुनिश्री ने धर्म का पालन की तुलना परीक्षा से करते हुए कहा कि आज लोग धर्म कर्म तो करते है लेकिन उन्हें पता नहीं कि हमे धर्म किस प्रकार करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण के द्वारा षिविरार्थियों को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार हम परीक्षा मे पेपर मे कुछ नहीं लिखेगे,प्रष्नो के उत्तर क्रम मे नहीं देगे या उत्तर गलत लिखेगे तो नम्बर षून्य प्राप्त होगे उसी प्रकार हम धर्म को नहीं करेंगे,उल्टा सीधा करेगे या गलत तरीके से करेगे तो पुण्य नहीं मिलेगा। मुनिश्री ने जोर देते हुए कहा कि जीवन मे कुछ भी कार्य करो उन्हे सही करो,व्यवस्थित करो एवं पूरा करो तो सफलता अवष्य मिलेगी। विनय कुमार जैन 9910938969

sharabak hi sandhna khandit karta hai - muni pulak sagar

समाज की विकृत मानसिकता पर अफसोस व्यक्त किया राश्ट्रसंत ने 29 मई 2012 भगवान ऋशभदेव के पास उच्च सहनन वाले थे वे जीवन भर एक बार भी आहार नहीं लेते तो उनका जीवन चल सकता था लेकिन उनके साथ अन्य राजागण जिन्होंने जिनेष्वरी दीक्षा ग्रहण की थी। भूख प्यास से आकुल व्याकुल हो गये और पथ भ्रश्ट होकर कोई पेड के फल खाना लगा तो कोई झरने का पानी पीने लगा। तभी आकाषवाणी हुई की आप इस वेष मे इस तरह अन्न जल ग्रहण नही कर सकते तो किसी ने पत्तो से अपना तन ढंक लिया तो किसी ने जटाएं बढ़ा ली। इस तरह चार हजार मुनि पथभ्रश्ट हो गये। उक्त मार्मिक विचार राश्ट्रसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने मॉडल बस्ती स्थित जैन मंदिर के हॉल मे सोमवार को श्रावको को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होने धर्म सभा को संबोधित करते हुए आगे कहा कि उन्हें आहार चर्या के बारे मे ज्ञान नहीं था, और महामुनि ऋशभदेव भी आहार की विधी ने मिलने के कारण छह माह तक उपवास करते रहे। मुनिश्री ने कहा कि उस समय श्रावकगण आहार दान को जानते उसको समझते तो क्या चार हजार साधू पथ से भटकते? क्या साधू अपनी साधना से भ्रश्ट होता? या श्रावक सहयोग न करे तो भ्रश्ट हो जाता है? क्या सारी गलती मुनिराजो की हैः- आज महानगरो मे साधूओं को षौच जाने के लिए खुली जगह नहीं मिल पा रही है,श्रावक बोलते है महाराज जी फिलेष मे जाओगे क्या। हमारे यहां साफ करने वाले नहीं मिलते है। अब क्या करे साधू अगर फिलेष मे जाता है तो आगम मे लिखा है कि साधू षौच आदि के लिए जहां भी जाएं अपनी पिच्छी से उस जगह को अच्छी तरह से परिमार्जित कर ले। अब आप ही सोचो जहां पहले से ही पानी भरा पडा है उसमे हजारो जीव बिलबिला रहे है वहां कैसे...? अब यह बताओ जब श्रावक ही कह देगा कि हमारे यहां व्यवस्था नहीं है तो ऐसे मे कैसे मुनिधर्म पलेगा? तो क्या सारी गलती महाराजो की है या तुम नाराजों की है? मै कहीं भी रहूं सुविधा के लिए धर्म के सिद्धांतो के साथ खिलवाड नहीं कर सकता हॅू। संतो की साधना को खंडित किया श्रावक के प्रमाद नेः- मुनिश्री ने कहा कि चौथे से अब तक पंचम काल आते आते मुनि धर्म की चर्याए 10 प्रतिषत ही बची है अब आपके आलस्य व प्रमाद से क्या उसको भी खत्म कर ले। तुम क्या अपने बच्चो को बताओगे की अपने महाराज ऐसे होते है। मुनिश्री ने कहा कि मूलाचार मे लिखा है कि श्रावक अगर श्रमण की चर्या मे सहायक नहीं बनेगा, श्रावक नवद्या भक्ति भूल जाएगा तो साधू साधना कैसे करेगा। याद रखना दिगम्बर साधू भी आप सबके बीच मे से कोई बनता है,वह आकाष से टपका हुआ नहीं होता है। मुनि भी कभी समाज के बच्चे हुआ करते है उनको भी उनके माता पिता उतना ही प्यार करते होगे जितना तुम अपने बच्चो को करते हो। साधू संत कोई कचरे से ढेर से तो उठके आते नहीं है, जितने अरमान तुम्हारे है उतने ही अरमान साधूओं के माता पिता के भी होते है।
दिगम्बर साधू सदा परमार्थ के लिए जीता हैः- मुनिश्री ने कहा कि जब साधू अपना घर छोडता है तो उस साधू की जबावदारी सारी समाज की हो जाती है, अब समाज की क्या जबावदारी बनती है कि साधू को साधना के अनुकूल रखोगे की प्रतिकूल? मुनिश्री ने कहा कि साधू समाज से क्या लेता है? केवल एक बार आहार और इसके अलावा अपने लिए क्या लेता है? अगर कोई श्रावक मेरी चोकी पर एक लाख रूपये रख जाये तो मै अपने लिए क्या उपयोग करूंगा? क्या उस एक लाख रूपये से मै अपने लिए अच्छे कपडे लाउंगा, नहीं ना। क्या अपने लिए बाजार से कुछ खाने को लाउंगा नहीं ना। ना ही उन रूपयो से खुद घूमने के लिए गाडी घोडा लाउंगा,मैने तो जीवन भर दिगम्बर वाना और पद विहार का नियम लिया है। अगर मै बिमार भी पड जाउं तो मै उन रूपयो से दवाई भी नही खरीद सकता। मै उन रूपयो का व्यक्तिगत कुछ भी उपयोग नहीं कर सकता हॅू। हॉ उन रूपयो से समाज अपने लिए मंदिर व धर्मषाला बना ले तो बात अलग है। लेकिन मै स्वयं उन रूपयो का उपयोग नहीं करूंगा। तीर्थ भी समाज के लिए बनाता है मुनिः- मुनिश्री ने कहा कि साधू संतो के पास हीरे मोतियो का ढेर भी लगा दो तो उनके कोई काम का नहीं है। याद रखना अगर कोई साधू संत अपनी प्रेरणा से कोई तीर्थ का निर्माण करवाता है तो क्या समाधी के बाद वह उस तीर्थ को छाती पर बांधकर ले जाएगा। भव्य एयरकूल्ड धर्मषालाओं का निर्माण करवाता है तो उसका उपयोग कौन करता है? समाज ही तो उनका उपयोग करती है। स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते है ऐसे ज्ञानी साधू जगत की दुख समूह को हरते है। दिगम्बर संत तो स्वार्थ का त्याग करके अपनी तपस्या किया करते है। दिगम्बर संत जो भी करेगे परमार्थ के लिए करेंगे, उपकार के लिए करेंगें। अंत मे नवद्या भक्ति की विरासत सौपते जानाः- मुनिश्री ने कहा कि आप लोगो से एक ही निवेदन है कि दौलत कमाना तो हर मां बाप अपने बच्चो को सिखाते है लेकिन आप अपने बच्चो को नवद्या भक्ति भी सिखाइये। आज इक्सिवी सदी मे जीने वाले बच्चे बहुत ही होषियार व समझदार हो गये है। आज जिस बच्चे को चलना नही आता वह मोबाइल पकडना चाहता है, अब गुड्डे गुडियो का खेल नही बच्चे बिडियो गेम खेलने लगे है। अगर आप अपने बच्चो को नवद्या भक्ति सीखा के नहीं जाओगे तो आप लोगो के जाने के बाद जैन ंधर्म से दूर हो जायेगे। मुनि क्या होते है उनको बताने वाला कोई नहीं होगा। बच्चो को आगे लाएं नही तो वे पिच्छी को झाडू ही कहेगेः-
मुनिश्री ने बुजुर्गाे से निवेदन कि समझदार सास का कर्त्तव्य होता है कि वह अपने बेटे बहू को मुनियो के आहार मे भेजे ताकि वे आहार दान को सीख सके। अगर तुम्हारे मरने के पहले बच्चे नवद्या भक्ति सीख गये तो तुम्हारे घर पर संतो के चरण पडते रहेगे नही तो अभी तो यह हाल है कि मैने एक बच्चे से पूछा कि मेरे हाथ मे यह मोर पंख है इसे क्या कहते है तो वह बोला झाडू, मैने कहा कि इससे क्या करते है तो बोला जहां आप बैठते होगे वहां पहले झाडू लगा लेते होगे, मैने कमण्डल को दिखाते हुए कहा कि यह क्या है बोला थरमस मैने पूछा इसका साधू क्या करते है तो बोला जब प्यास लगती होगी तो पानी पी लेते होगें। सिखाईये अपने बच्चो को साधूओ की नवद्या भक्ति। अंत मे जब विरासत मे धन दौलत, जमीन जायजाद सौपो तो साथ मे संस्कार भी सौपाते जाना ताकि तुम्हारे जानेे के बाद तुम्हारा यह जैन धर्म जीवित रहे। एक साधू एक चौका की परम्परा बंद कर दोः- मुनिश्री ने बडे अफसोस के साथ कहा कि महानगरो मे मुनियो के आहार की परम्परा बहुत ही विकृत होती जा रही है,जितने साधू उतने चौके, क्या आप अपने साधूओ को निमत्रित करके आहार कराओगे। फिर वे कैसे नियम लेगे, कैसे अपनी सिहवृत्ति का पालन कर पायेगे। मै बडे ही गौरव के साथ कह सकता हॅू कि आज भी बुंदेलखंड मे एक एक साधू के लिए दस दस चौके लगते है। जब श्रावक ही संत की साधना मे सहयोग नहीं करेगा तो वह साधना कैसे कर पायेगा। विनय कुमार जैन संघस्थ प्रवक्ता 9910938969