गुरुवार, 10 मई 2012
वीतरागता मे ही सच्चा सुख- muni pulak sagar
वीतरागता मे ही सच्चा सुख-मुनि पुलकसागर
अनुषासन की मिषाल बना मां जिनवाणी षिक्षण षिविर
दिल्ली 10 मई 2012 आत्मा के दो गुण होते है स्वभाव गुण व विभाव गुण । ऐसे परिणाम जो पर द्रव्य के निमित्त से होते है वह विभाव गुण होते है जैसे सुख दुख,राग द्वेश,लोभ, मान,माया लोभ खाना पीना आदि विभाव गुण के उदाहरण है और जो स्व निमित्त से होते है अर्थात पर द्रव्य के निमित्त से नहीं होते है स्वभाव गुण कहलाते है जैसे क्षमा,वीतरागता आदि। उक्त प्रेरक उद्बोधन राश्टसंत मुनिश्री पुलक सागर जी महाराज ने भोलानाथ षाहदरा मे आयोजित मां जिनवाणी षिक्षिण षिविर मे षिविरार्थियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने षिविर्थियों को विभाव व स्वभाव गुण को समझाते हुए कहा कि पानी मे षीलता उसका स्वाभाविक गुण है और उश्णता विभाव गुण है क्योकि पानी मे उश्णता आग के निमित्त से आती है। वैसे ही क्रोध आदि कशाय परिणाम दूसरो के निमित्त से होता है और क्षमा आदि अच्दे परिणाम अपने निमित्त से होते हैै।
मुनिश्री ने राग,द्वेश,मोह की परिभाशा बताते हुए कहा कि अच्छा लगना राग है, बुरा लगना द्वेश है और अपना मानने का भाव मोह है। ये तीनो ही आत्मा को दुख देने वाले है। राग द्वेश,मोह का नहीं होना ही वीतरागता है। वीतरागता आत्मा को षाष्वत सुख देने वाली मोक्ष देने वाली होती है।
मुनिश्री प्रसंगसागर जी ने किए केषलोच-
संघस्थ प्रवक्ता विनय कुमार जैन ने बताया कि मां जिनवाणी षिक्षण षिविर की चहूं ओर प्रषंसा-
राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज के अनुज गुरू भाई संघस्थ मुनिश्री प्रसंगसागर जी महाराज ने आज प्रातः 6 बजे केषलोच किए। इस अवसर पर भोलानाथ दिगम्बर जैन समाज के श्रद्धालूजन बड़ी संख्या मे उपस्थित थे। ज्ञात हो कि दिगम्बर जैन मुनि चार माह के अंतराल पर केषलोच किया करते है।
राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज के पावन सानिध्य मे जितने भी पंचकल्याण, प्रवचन मालाएं या षिक्षण षिविरो का आयोजन किया जाता है उन सबमे अनुषासन व वक्त का विषेश ख्याल रखा जाता है। भोलानाथ नगर षाहदरा मे आयोजित मां जिनवाणी षिक्षण षिविर मे भी अनुषासन व वक्त की पाबंदी की मिषाल देखने को मिल रही है। प्रातः काल 7 बजे से षिविरार्थी पूजन के लिए एकत्रित होते है। मुनिश्री की कक्षा ठीक 8ः30 से प्रारंभ होती है और 9ः30 पर समाप्त हो जाती है।
बुधवार, 9 मई 2012
हमारे देश् से भू्रण हत्या बंद होना चाहिए -muni pulak sagar
राश्ट्रसंत जैन मुनि पुलकसागर जी महाराज ने किया सत्यमेव जयते का समर्थन और कहा
हमारे देष से षीघ्र ही भू्रण हत्या बंद होना चाहिए -मुनि पुलकसागर
भ्रूण हत्या इस देश पर कलंक है। पालनहार ही मारणहार बन जाएंगे तो मानवीयता पर प्रष्न चिन्ह खड़ा हो जाएगा। जानबूझकर भ्रूण हत्या कराने वाली मां,भू्रण हत्या को प्रेरित करने वाला पति और भ्रूण हत्या करने वाला डॉक्टर ये तीनो हत्यारे है। इनके हाथ इंसानियत के खून से रंगे हुए है। जो सजा एक इंसान की हत्या करने पर मिलती है वही सजा भू्रण हत्या पर भी मिलना चाहिए।
मै तो इतना ही कहंूगा कि अनचाही औलाद अगर गर्भ मे आ गई तो उसे मारे न उसे ना पाल सको तो मुझ जैसे संत के दरवाजे पर डाल देना पर उसे जन्म लेने का मौका जरूर देना।
अभिनेता आमिर खान ने जो कन्याभू्रण हत्या पर सत्यमेव जयते स्टार प्लस चैनल के माध्यम से जो सामाजिक बुराईयों पर समाज का ध्यान आकर्शित किया है, निष्चित ही मानवीयता को झंकझोर कर रख दिया है। हांलाकि मै भी इस मिषन पर वर्शो से कार्य कर रहा हॅू पर मेरी आवाज को आमिर खान जैसे नेक दिल इंसान ने और भी बुलंद कर दिया है। इस मिषन पर मै और मेरा समर्थन हमेषा उनके साथ रहेगा।
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गण्डा,ताबीज अंधविष्वास इससे दूर रहे- मुनि पुलकसागर
षिविर के तीसरे दिन मुनिश्री ने दिलाई षपथ मिथ्यात्व से दूर रहेंगे षिविरार्थी
दिल्ली 9 मई 2012 मां जिनवाणी षिक्षण षिविर के तीसरे दिन आज मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने षिविरार्थीयो को संगत का प्रभाव बताते हुए मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने कहा कि हमारे जीवन पर संगत का बहुत व्यापक असर पड़ता है। जिस प्रकार स्वाती नक्षत्र मे पानी की बॅूद अगर सीप मे पड़ जाए तो मोती,सर्प के मंुंह मे जहर, कैले के पौधे पर तो कपूर,गन्ने मे रस बन जाती है उसी प्रकार हमारी आत्मा पर बुरे कर्म अपने मे कसते है तो आत्मा भी मलिन होती है,और विशय वासना के वषीभूत होकर संसार सागर मे रमण करती रहती है।
मुनिश्री ने षिविरार्थीयों को आगे संबोधित करते हुए कहा कि मै अपना जन्म दिन नही मनाता हॅू, क्योकि मैने दीक्षा संसार से मुक्त होने के लिए ली हे ना कि इसमे रमने के लिए। लोग कहते है कि मुनिश्री हम आपका जन्म दिन मनाना चाहते है तो मै उनसे केवल इतना ही कहता हॅू कि मनाना है तो दीक्षा दिवस मनाओ। भगवान के कल्याणक मनाओ। मुनिश्री ने आगे कहा कि तुमने जिन कुल मे जन्म लिया है तो इस जन्म को सफल करो,तंत्र,मंत्र से जीवन मे कभी भी खुषहाली नहीं आएगी,ना ही कोई तंत्र मंत्र जानने वाला बाबा तुम्हारे जीवन को सुखमय बना सकता है। षास्वत सुख अगर चाहते हो तो परम वीतराग मुद्रा के धारी जिनेन्द्र प्रभू की षरण मे आ जाओं तुम्हारा कल्याण हो जाएगा और निर्वाण पद को प्राप्त हो जाएगा।
मंगलवार, 8 मई 2012
भोलानाथ नगर मे मां जिनवाणी शिक्षिण शिविर का द्वितीय दिवस
दिल्ली 7 मई 2012 राष्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री प्रसंगसागर जी महाराज के पावन सानिध्य मे भोलानाथ शाहदरा मे आयोजित मां जिनवाणी षिक्षिण षिविर के द्वितीय दिवस मे शिविरार्थीयो के साथ-साथ अन्य श्रद्धालुओं की बेहताशा उपस्थित की कारण आज सामूदायिक भवन छोटा पड़ गया। मुनिश्री की अद्भुत शिक्षक कौशल गुण के कारण लोगो की उपस्थिती दिनो दिन बढ़ती जा रही है।
इस अवसर पर मुनिश्री ने प्रभू पतित पावन मै अपावन चरण आऔ शरण जी,यॅू विरध आप निहार स्वामी मैट जावन मरण जी। की सरल व सुगम व्याख्या कर लोगो को धर्मामृत पिलाया।
शनिवार, 5 मई 2012
muni pulak sagar महाराज से विशेष बातचीत
मुनिश्री पुलकसागरजी महाराज से विशेष बातचीत
संत दिशा बताते हैं चलना समाज को-मुनि पुलक सागर
मुनिश्री पुलक सागरजी का कहना है कि संत का काम समाज को सही दिशा दिखाना है, लेकिन उस दिशा पर, उस राह पर आगे बढ़ने का काम तो समाज को ही करना होता है। संत यानी वो जिसे समय से पहले ज्ञान का आभास हो जाए, उसके दर्शन हो जाएं। संत न पैदा होते हैं, न बनाए जाते हैं, संत तो बन जाते हैं। संतई मन की एक बहुत विशिष्ट और उच्च अवस्था है। आज का युवा उत्थान और पतन के दोराहे पर खड़ा है। समय रहते यदि हमने उन्हें संस्कार न दिए तो हम उनके भविष्य के हत्यारे तो होंगे ही, साथ में अपना बुढ़ापा भी बिगाड़ लेंगे। ये संतों जिना ही माता-पिता और बुजुर्गों का भी दायित्व है कि वे युवाओं को संस्कारों से नवाजें और उन्हें इस दोराहे से आगे सही दिशा में बढ़ने का रास्ता सुझाएँ। इसके लिए जरूरी है कि बुजुर्गों में भी संस्कार हो। बात संस्कारों की हो या ज्ञान की, पूरी दुनिया में भारत का कोई मुकाबला नहीं है। सारी दुनिया में भारत वह सोने की चिड़िया है, जिसका सांस्कृतिक व आदर्शमय वैभव देखकर आज भी विदेशी ललचते हैं।
प्रश्न: महाराजश्री संत समुदाय चाहे तो समाज की और देश की सूरत बदल सकता है, क्या यह सही है?
मुनिश्री: संत यदि कुछ न बोले तो यह भी ठीक नहीं और कोई संत बोले और समाज की दिशा बदलने की बात कहे तो यह भी सही नहीं, क्योंकि जब तक सामने वाला खुद बदलना नहीं चाहे तब तक भगवान भी उसे बदल नहीं सकते। फिर भी मैं कहता सकता हूँ कि आज हमारे देश में जितनी भी इन्सानियत व नैतिकता मौजूद है, वह संतों की बदौलत है, वरना आप पड़ोसी देशों को देख सकते हैं, जहाँ संत नहीं। वहाँ न मानवीयता है, न रिश्ते होते हैं। संत समाज को केवल सही दिशा का ज्ञान करा सकते हैं, इसलिए सभी संत समाज को और लोगों को सही और गलत में फर्क समझाकर अच्छाई की राह दिखाने का काम कर सकते हैं। उसे मानना न मानना और उस पर चलना सामने वाले पर निर्भर करता है।
प्रश्न: युवा पीढ़ी के साथ संस्कार और संगति की दिक्कत है। यदि सकूल-कॉलेजों में संतश्री के प्रवचन कराए जाएँ तो युवा पीढ़ी को भटकने से रोका जा सकता है?
मुनिश्री: स्कूल-कॉलेजों में प्रवचन देने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन आज के बच्चे किसके साथ उठते-बैठते हैं, उनका फैमिली बैकग्राउंड क्या है और वो किस माहौल में रह रहे हैं, इस बात का असर उन पर ज्यादा पड़ता है। बुनियादी बात यह है कि आज शिक्षा जीवन निर्वाह का सबब बन गई है। पढ़ाने वाला और पढ़ने वाले इसे आजीविका की तरह लेने लगे हैं, जबकि शिक्षा जीवन निर्वाह के जरिए से ज्यादा जीवन निर्माण की कला होनी चाहिए। संत बच्चों को प्रवचन देंगे तो उसका असर उन पर पड़ेगा पर वो तात्कालिक ज्यादा होगा। लम्बे समय तक असर के लिए माता-पिता को ध्यान रखनी चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी भटके नहीं।
प्रश्न: ऐसा क्यों है कि सुधार तो सभी चाहते हैं, लेकिन कामना यही करते हैं शुरुआत दूसरे करें मसलन लोग यह भी कहते मिलते हैं कि संत तो पैदा हो, मगर पड़ोसी के यहाँ?
मुनिश्री: संत दो तरह के होते हैं। एक तो वह जो दुःखों से बनता है और दूसरा वह जो जीते जी मुक्ति के सुत्रा पाने के लिए साधना में रत हो जाता है। उसे दुःख से दुःखी और सुख से सुखी नहीं होना चाहिए। उसे तो हमेशा हँसते रहना आता है। असल में अधिक सुख की चाहत ही दुःख का कारण बनती है। फिर संत न पैदा होते हैं, न बनाए जा सकते हैं।
संत वह होता है, जिसे समय से पहले ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। संत ज्ञानेश्वर को नौ साल की उम्र में ही संत कुंदकुंद को आठ वर्ष की अवस्था में ही ब्रह्मज्ञान का आभास हो गया था। इसी तरह संत कुंदकुंद को आठ वर्ष की अवस्था में ही सत्य का पता चल गया था। यों संत बनना हरेक के लिए जरूरी नहीं है। आप अपने मन को संत के समान बना लें तो इतना भी बहुत काफी है।
प्रश्न ः युवा देश के कर्णधार और भविष्य हैं, उनके उत्थान और मार्गदर्शन के लिए क्या होना चाहिए?
मुनिश्री: वास्तव में अब देश को युवा पीढ़ी ही देश का भविष्य तय करेगी। समस्या ये है कि आज का युवा उत्थान और पतन के दोराहे पर खड़ा है। उसके पास चलने की ऊर्जा और साहस दोनों है, मगर दिशादृष्टि नहीं है। यदि हमने यानी माता-पिता, गुरु और संत समुदाय ने उन्हें सही रास्ते का पता नहीं दिया तो उनका और देश का भविष्य संकटग्रस्त होगा।
प्रश्न: आजकल संतों की जमातभी होने लगी, क्या यह उचित है?
मुनिश्री: संतों की कोई जमात नहीं होती और जमात से हटकर चलने वाले और ऊँची सोच रखने वाले को ही संत कहते हैं। यदि उसे जमात के ही बंधन में रहना हो तो वो माता-पिता क्या बुरे हैं, जिन्होंने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया? सो संत हर जमात से परे होते हैं और इलाका भीड़ भरा हो या सुनसान संतहर परिस्थिति में हमेशा अकेला
होता है।
प्रश्न: अपने अनुयायियों को आपका कोई सन्देश?
मुनिश्री: संत कभी अपने अनुयायी या फॉलोअर नहीं बनाता। लोग उनके अनुयायी बन जाते हैं, फिर भी मैं यही कहना चाहता हूँ कि मेरे अनुयायी बनने से तुम्हारा भला नहीं होगा, क्योंकि मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आऊँगा। हाँ, मेरे विचारों के अनुकूल बन जाओ, मेरे विचार तुम्हारे बहुत काम आएँगे। एक व्यक्ति अपने स्व का कल्याण कर लें यही बहुत है। खुद का कल्याण सबसे बड़ा जतन है और इसके बाद किसी दूसरे की कल्याण की चिन्ता की बात आती है। यूं यह शहर तो संतों का बहुत सम्मान करने वाला शहर है। दया, कृपा जैसी कोई चीज मिल भी जाती है, लेकिन वो सुकून नहीं देती है।
प्रश्न: छोटे बच्चों को शिक्षा और संस्कार देना अति आवश्यक है?
मुनिश्री: बच्चों को संस्कारयुक्त बनाया जाना चाहिए, लेकिन आजकल हम बच्चों पर संस्कार थोपने का काम कर रहे हैं। मेरा मानना है कि बच्चों के बजाए पहले बुजुर्गों में संस्कार होना चाहिए। बुजुर्ग यदि संस्कारों को पालेंगे और उस अनुरूप आचरण करेंगे तो वो अपने आप बच्चों में आएँगे। अभी संस्कार देने के नाम पर बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है। वास्तव में देखा जाए तो बच्चों का बचपन कृष्ण जैसा होना चाहिए। फिर जवान राम जैसी और बुढ़ापा महावीर जैसा होना चाहिए। बचपन और जवानी के लिए युवाओं को सही मार्गदर्शन देना जरूरी है वरना बच्चे और युवा अपने उद्देश्य से भटक जाएँगे।
प्रश्न: क्या कभी किसी बात से आप विचलित हुए हैं, ऐसा कोई संस्मरण बताएं।
मुनिश्री: ऐसा तो कभी हुआ नहीं, फिर भी किसी को वेदना होती है तो मुझे कष्ट होता है और मुझसे किसी को पीड़ा पहुँचती है तो मैं विचलित हो जाता हूँ।
प्रश्न: आप तो भारतवर्ष में भ्रमण करते रहते हैं, दूसरे देशों की अपेक्षा हम कहाँ हैं?
मुनिश्री: बात संस्कार की हो, आदर्शों की हो, ज्ञान की हो या सभ्यता की, दुनिया में भारत का कोई मुकाबला नहीं है। भारत बहुत का कोई मुकाबला नहीं है। भारत बहुत संवेदनशील देश है। अभी जब मुम्बई, जयपुर जैसे शहरों में बम ब्लास्ट हुए तो सैकड़ों लोग सड़कों पर कराहते पाए गए, तब हम इतने संवेदनशील हो गए कि हमने यह नहीं देखा कि हिन्दू करहा रहा है या मुसलमान। हम एक दूसरे के जख्मों पर मरहम लगाने लगे। हम हमेशा दुश्मी रखने वाले पड़ोसी देश के साथ भी शान्ति की बात कर रहे हैं। बात चाहे भौतिकता की खोज हो या किसी भी तरह की रिसर्च की, भारत हर मामले में अग्रणी है।
प्रश्न: जिस तरह से अलग-अलग धर्म के लोग हमारे यहाँ अपने अलग-अलग त्योहार मानते हैं, उसी तरह से यदि हम सब 15 अगस्त और 26 जनवरी मनाएँ तो कैसा रहेगा?
मुनिश्री: इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती है। अगर सभी धर्मों के लोग मजहब से ऊपर उठकर 15 अगस्त और 26 जनवरी देशभर में धूमधाम से मनाएँ तो इसमें क्या बुराई है। मैं 15 अगस्त और 26 जनवरी पर्व मनाने के लिए अपने प्रवचन में विशेष आग्रह ही नहीं करता, बल्कि जहाँ भी रहता हूँ अतिउत्साह से राष्ट्रीय पर्वों की महोत्सव के रूप में मनाता हूँ। यदि सभी धर्मों के संत एकजुट हो जाएँ और राष्ट्रीय पर्व मनाने का आह्नान करें तो बदलाव आ सकता है, लेकिन हर संत अपनी मजहबी दीवारों से घिरा हुआ है। आज वेलेंटाइन-डे भी मनाया जा रहा है और राष्ट्रीय पर्व की तरफ ध्यान कम है।
प्रश्न: क्या कारण है कि जैन समुदाय में दूसरे समाज के लोग भी संत होते हैं और दिगम्बर सम्प्रदाय के संत कम होते हैं?
मुनिश्री: ऐसा नहीं है। दिगम्बर जैन सम्प्रदाय में फिलहाल 1200 संत हैं। इसमें से केवल चार-पांच ही बाहरी हैं, शेष सभी यहीं के हैं। कठोर साधना और तपस्या के तरीके की तुलना नहीं की जा सकती। साधना से ही साधन और शान्ति नहीं मिलती, बल्कि मृत्यु का अनुभव जीते जी होना चाहिए। यही साधना है।
प्रश्न: इलेक्ट्रॉनिक्स संचार साधनों के सम्बन्ध में आप कहेंगे?
मुनिश्री: संचार के माध्यमों की ही बात है कि अब पूरे विश्व में कोई फर्क नहीं रह गया है। फर्क बस इतना है कि इन संचार साधनों का दुरुपयोग रुकना चाहिए। आज हमारे संचार साधनों और संस्कृति पर पाश्चात्य देशों का प्रभाव पड़ रहा है, जबकि हमें हमारी संस्कृति की ओर ध्यान देना चाहिए।
प्रश्न: क्या आपके मन में भी मन्दिर या धर्मशाला आदि बनाने की बात कभी आई है?
मुनिश्री: नहीं। मैं तो केवल मानवमात्रा के लिए कुछ करना चाहता हूँ और उसके लिए पुष्पगिरि में एक वात्सल्यधाम की स्थापना की गई है, जिसमें तीन वर्गों के बुजुर्गों को रखा जा रहा है। एक तो वे जिनकी कोई औलाद नहीं है, दूसरे वे जिनकी औलाद तो है, परन्तु वो उन्हें साथ नहीं रखना चाहती और तीसरे वे जिनकी औलादें विदेशों में हैं और वे यहाँ अकेले रहते हैं। इसी तरह विधवा, परित्यक्त महिलाएँ भी हैं और बच्चों को भी रखा गया है और सभी एक साथ रह रहे हैं। हमने अनाथाश्रम नाम रखने के बजाए वात्सल्यधाम नाम रखा है। फिलहाल यहाँ 40बच्चे एवं 21 बुजुर्ग निवास कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर जैन समुदाय के हैं, लेकिन इसमें जाति का कोई बंधन नहीं है। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोग करुणा का भी दुरुपयोग करते हैं। हमारी करुणा वो अपनी स्वार्थसिद्धि में लगाने लगते हैं तो हमारा मिशन कमजोर होने लगता है।
प्रश्न: मीडिया देश का चौथा स्तम्भ है, इसके विषय में आप क्या कहेंगे?
मुनिश्री: मीडिया के बगैर दुनिया आज भी अधूरी है, क्योंकि लाखों लोगों तक अपनी आवाज और अपनी बात मीडिया के माध्यम से ही पहुँचती है। दशरथ और राम के वनवास के सम्बन्ध में भी अगर तुलसीदासजी रामायण नहीं लिखते तो शायद आज रामायण इतनी प्रसिद्ध नहीं होती, दशरथ के वो राम जो कर छोड़क वन में गए, वे फिर से रामायण के माध्यम से घर-घर वापस नहीं पहुँच पाते। तुलसीदास की तरह ही आज मीडिया की भूमिका है।
प्रश्न: यदि आप संत नहीं होते, तो कवि होते?
मुनिश्री: (हंसकर) मैं संत हूँ, इसलिए ही कवि हूँ, क्योंकि मेरी मान्यता है कि जो संत होता है वो कवि जरूर होता है, पर जो कवि होता है, वह संत हो यह जरूरी नहीं। कुंदकुंद, तुलसी, मीरा, सूर ये सब संत थे और कवि भी थे।
कर्महीन लोग जीवन मे उन्नति प्राप्त नहीं कर पाते- muni pulaksagar
कर्महीन लोग जीवन मे उन्नति प्राप्त नहीं कर पाते-मुनि पुलकसागर
दिल्ली 5 मई 2012 रात को भी दिन निकल सकता है,दिन को भी रात हो सकती है,लोग कहते है,समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता लेकिन मेरी श्रद्धा कहती है कि गुरू की कृपा हो जाए तो समय से पहले और भाग्य से अधिक भी मिल सकता है। उक्त विचार राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने आज भोलानाथ नगर षाहदरा स्थित सामुदायिक भवन मे आयोजित ज्ञान गंगा महोत्सव के चौथेे दिन श्रावकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
गुरू के महत्व को प्रतिपादित करते हुए मुनिश्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आगे कहा कि गुरू की कृपा से भौतिक सुख-संपदा तो छोड़ो मोक्ष लक्ष्मी को भी प्राप्त किया जा सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि भगवान की मूर्ति मौन है,षास्त्र मौन है आप जैसा चाहे अर्थ लगा सकते हो पर गुरू मौन नहीं होते है वे मुखर होते है जो तुम्हारे अहंकार पर चोट करते है। याद रखना साधू वही होता है जो तुम्हारे अहंकार पर चोट करे। साधू वह नहीं होता जो तुम्हारे अहंकार की पुश्टि करे। याद रखना मंदिर की मूर्ति कुछ समय पहले तक सड़क का पत्थर हुआ करता है लेकिन जब उस पर किसी षिल्पी की नजर पडती है तो मूर्ति का रूप ले लेता है लेकिन कोई सद्गुरू ही होता है जो उसमे भगवत्ता को प्रकट कर दिया करता है।
मुनिश्री ने जीवन मे लक्ष्य बनाने की सीख देते हुए कहा कि हर व्यक्ति के जीवन मे एक न एक लक्ष्य अवष्य होना चाहिए,बिना लक्ष्य के जीवन मे उंचाईयॉ हासिल नहीं हो सकती है। यहां पर जितने भी लोग बैठे है सबका कोई ना कोई लक्ष्य अवष्य होगा। विद्यार्थीयों का लक्ष्य परीक्षा मे सफलता,व्यापारी का पैसा कमाना लक्ष्य हो सकता है लेकिन मै एक बात आपसे बड़ी विन्रमता के साथ कहना चाहता हॅू कि यह लक्ष्य तो चिता के साथ जलकर भस्म हो जाएगे,अगर जीवन मे लक्ष्य बनाना ही है तो निर्वाण को अपना लक्ष्य बनाओ, मोक्ष को अपना लक्ष्य बनाओ।
शुक्रवार, 4 मई 2012
इंसान चलना भूल गया- muni pulaksagar
दिल्ली 4 मई 2012
तमाम उंचे दरख्तो से बचकर चलता हॅू,
मुझे पता है कि छाया इनके पास नहीं,
गरीब की झोपड़ी मे सर छुपा सकते हो,
अमीरों का तो कोई लिबास नहीं।
आज बंगले उंचे लेकिन आदमी बोना हो गया है, किसी गरीब के घर मे पीने को एक गिलास पानी मिल सकता है लेकिन अमीर के पास मिल जाए इसकी गारंटी नहीं। उक्त विचार राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने आज भोलानाथ नगर षाहदरा स्थित सामुदायिक भवन मे आयोजित ज्ञान गंगा महोत्सव के तीसरे दिन श्रावकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने धर्म को संबोधित करते हुए आगे कहा कि अगर आप गरीब है तो मै सुखी होना एक मंत्र देता हॅू आज से तुम अपने से गरीब आदमी को देखकर जीना षुरू कर दो और अमीरों को देखकर जीना छोड़ दो। तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाएगा।
गर्दन मे लचक पड़ जाएगीः-
निगाहे नीची रखकर चलने का संदेष देते हुए मुनिश्री ने कहा कि आज के आदमी को न जाने क्या हो गया है वह चलता तो जमीन पर लेकिन देखता आसमान में है। नजरे झुकाकर चलोगे तो जमीन पर पड़ी हुई अनमोल वस्तु भी मिल सकती है लेकिन नजरे उठाकर चलोगे तो ठोकर लग सकती है जिससे तुम जख्मी हो सकते हो। ज्यादा उपर देखकर जिओगे तो केवल गर्दन मे दर्द हो गया मिलेगा कुछ भी नहीं। मेरे भाई पक्षी भी आसमान मे उड़ता है तो निगाहे धरती पर ही जमा कर उड़ता है।
जमीन से जुड़कर जिओः-
मुनिश्री ने कहा कि आज के विज्ञान ने लोगो को पक्षिओं की तरह हवा मे उड़ना सिखा दिया,मछलियों की तरह पानी मे तैरना सिखा दिया लेकिन दुख तो इस बात का है कि आज आदमी जमीन पर चलना भूल गया हैं। व्यक्ति का जमीन से सबंध टूट गया है। जमीन से जुड़कर जीना विज्ञान नहीं सिखाएगा इसे सीखने के लिए तो हमे भगवान महावीर की षरण मे आना पड़ेगा। धर्म की षरण मे आना पड़ेगा धर्म की जमीन से जुड़कर चलना सिखाता है।
अकड़ मुर्दे की पहचान हैः-
अकड़ को मुर्दे की पहचान बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि झुकेगा वही जिसमें जान है,अकड़ मुर्दे की खास पहचान है। षीष झुकाओगे तो आषीश मिलेगा। नजरे झुकाकर जिओगे तो दुनिया तुम्हें पलको पर बिठा लेगी और नजरो को उठाकर जिओगे तो यही दुनिया तुम्हें नीचा दिखा देगी। अहंकार से बचने एवं झुकने के फायदे बताते हुए कहा कि जिस प्रकार नदी किनारे लगे छोटे पौधे,बेले बाढ़ के समय झुक जाते है जबकि बड़े पेड़ अकड़ के खड़े रहते है,बाढ़ निकल जाने के बाद बेले फिर से लहलहाने लगती है जबकि पेड जड़ से उखड़ जाया करते है।
तुम्हारी औकात क्या हैः-
मुनिश्री ने रूपये,पैसो को हाथ का मैल बताते हुए कहा इस धरती पर एक से बढ़कर एक चक्रवर्ती,धनकुबेर आएं लेकिन उनका नाम निषान भी नहीं है फिर तुम किस बात पर अभिमान करते हो। लोग थोड़ा सा रूपया पैसा कमाकर अहंकार के वषीभूत होकर फूले नहीं समाते है लेकिन याद रखना असली दौलत प्रभू की भक्ति है।
विनय कुमार जैन
मो 9910938969
गुरुवार, 3 मई 2012
अपने आपको उपयोग बनाएं- muni pulak sagar
अपने आपको उपयोग बनाएं-मुनि पुलकसागर
चातुर्मास हेतु श्रीफल भेट किए भोलानाथ नगर जैन समाज ने
जीवन मे हर पल अपने आपको उपयोगी बनाएं रखिए। जब तक गाय दूध देती हे तब तक ही उसकी सेवा होती है,जब वह दूध देना बंद कर देती है तो वह भार लगने लगती है,बूढे़ बेल का क्या हाल होता है वह आप भली भांति जानते है।
उक्त विचार राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी महाराज ने भोलानाथ नगर स्थित सामुदिय भवन मे आयोजित तीन दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के प्रथम दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने आगे कहा कि घर,परिवार,समाज के लिए आप कितने उपयोगी है यह देखा जाता है। उपयोगिता का सबंध अपरिचित से होता है और कोई आपसे तब तक नहीं जुड़ता तब तक उसे आपसे कोई फायदा न हो। एक पोधे को जिसमे न फल लगते है और न ही फूल आते हे तो उसे आप कब तक पानी से सीचोगे। कर्महीन इंसान को जीवन मे उंचाईयॉ हासिल नहीं होती है।
संघस्थ प्रवक्ता विनय कुमार जैन ने बताया कि राश्टसंत मुनिश्री पुलकसागर जी गुरूदेव एवं मुनिश्री प्रसंगसागर जी महाराज के आगामी चातुर्मास हेतु सकल जैन समाज भोलानाथ नगर की ओर श्रीफल भेटकर मुनिश्री से निवेदन किया कि गुरूदेव आपका आगामी चातुर्मास भोलानाथ नगर को प्राप्त हो।
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